Author: जुझार सिंह

मेरा भारत

*मेरा भारत*

मेरा भारत ऐसा हो जाएं ,
आने वाले सालों में,

बासंती संकल्प जुट जाएं ,
नवयुग के आवाहन में,
स्वर्णिम भावों से वंचित ,
अब नहीं रहे युग सेनानी,
स्वर्णिम आभा बनी रहे ,
पिछड़ न जाएं बलिदानी ,
दिशा दिशा में फैली रहें ,
शौर्य गाथा भारत की,
नई प्रेरणा के पल्लव,
लहराए जनमानस में,

मेरा भारत ऐसा हो जाएं ,

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अपनो से पराया

अपनों ने कर दिया आज मुझे पराया
क्या मैं इतना बुरा लगने लगा हूं।
हर तरफ से दर्द के पत्थर बरसते हैं
क्या मैं इतना बुरा लगने लगा हूं।
क्यू लोग मेरे प्यार को नहीं समझते
क्या मैं इतना बुरा लगने लगा हूं।
मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है क्या अब
क्या मैं इतना बुरा लगने लगा हूं।
मैं मौत को गले नहीं लगा सकता हूं,

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राजह्थानी कहानी

इस्कूल री बात
राम राम सा !!

आजकाल इस्कूल भोत बदळीजग्या । टाबर भी एकदम छोटा छोटा इस्कूल जावै और मास्टरां गी जग्यां फूटरी फूटरी मैडम हुवै ।

म्हारै जमाने में आठवीं मैं भी दाढ़ी मूंछ हाळा इस्टूडेंट हुँवता …..दसवीं मै तो दो तीन टाबरां गा माईत भी पढ़ाई करता ।
और मास्टर गी तो पूछो मत ….धोती और खद्दर गो चोळो , एक एक बिलांत गी मूंछ ….जाणै जल्लाद है । ऊपर स्युं हाथ मै तेल स्युं चोपडेड़ो डंडो !!!

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योग से निरोग

कुछ अलग सी दुनिया का अलग मिजाज लिख दू
कदम बढ़ाते 21 वी सदी में भारत के नाम लिख दू
मुझे नहीं तमन्ना दरबारों के गुणगान करने की
देश हित में रहते हैं जो लोग उन्हीं लोगों के  नाम लिख दू

कुछ तूफानी लिखना छोड़ आज योग लिख दूं
पुरातन की संस्कृति के नव के नव संस्कृति के नव निर्माण को लिख दू
मुझे नहीं जिम जाकर जाकर पसीना बहाने की चाहत
मैं घर पर ही ऋषि मुनियों की योग साधना साधना की योग साधना साधना तप ही कर लू

आओ मिलकर योग करते हैं
काया को योग से निरोग करते हैं
प्रभात की बेला में में सूर्य नमस्कार करते हैं
आओ मिलकर योग करते हैं

अखंड भारत के सपने की मिलकर हुंकार भरते हैं
विश्व को एक सूत्र में बांधने का प्रयास करते हैं
हर तरफ से छाया हुआ है महामारी का खौफ इस कदर
आओ मिलकर योग से इसे परास्त का प्रयास करते हैं आओ मिलकर योग योग मिलकर योग योग करते हैं

इस दिवस पर महामारी से पार पाते हैं
बिछड़े हुए जोड़ों के प्यार का इजहार कराते हैं
दुनिया में पास आकर नहीं कर योग सकते तो क्या
सभी को बोल कर घर पर ही योग कराते हैं

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विजय गाथा लिख देता हूं मैं कश्मीर के घाटी की

विजय गाथा लिख देता हूं मैं कश्मीर के घाटी की
तपोवन की स्थली स्वर्ग के माटी की

उस धरा की जहां फूलों की खुशबू महक उठती थी
वही भूमि जिसे देख परिया शर्माती थी

आज उस धरा का स्वर्णिम युग आया
कश्मीर आज भारत का मुकुट फिर से कहलाया

कारगिल से कन्याकुमारी तक बस एक ही आवाज थी
बुलंद रहे तिरंगा हर भारतवासी की आवाज थी

कुछ सियारों को आज घड़ियाली आंसू रोते देखा
कुछ कुत्तों की दुम को सीधा देखा

वही कुत्ते आज खामोश हो गए
आतंक का तो पता नहीं पत्थरबाज गुम हो गए
कश्मीरी पंडितों की याद आते ही रूह कांप जाता था
यह करुणामय दृश्य हमेशा मुझे रुलाता था

उस दृश्य का अंत हो गया घाटी से
तपोवन की स्थली स्वर्ग की माटी से

तोड़ आतंक को दो हिस्सों में
नया इतिहास लिखने में
मुखर्जी की याद दिला दी
तुम्हें बहुत लगा था 370 हटाने में

“सृजन”

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बरसात का मौसम

कभी बरसात के मौसम में
कभी पतझड़ के मौसम में
उसी की याद आती है
हर लम्हा के मौसम में

वो इस कदर मुरत है मोहब्बत की
छा जाती है फूलो में बंसत के मौसम सी

मुझे इंतजार था ग्रीष्म में
पानी बनके मिलने आओगी
वर्षा का है इंतजार
नवनिर्माण कराओगी

मुझे जीना है तेरे साथ
तु साथ दे देना
करेगे प्यार ऐसा
तु कल दे देना

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मोहब्बत का एक अनसुना किस्सा भाग -02

भाग 1: https://rentreadbuy.com/index.php/2020/06/16/mohabbat-ka-ek-ansuna-kissa-1

मन मसलकर पापा को ले आता है परंतु उसने देखा नहीं
अगले दिन फिर वही होता है जाता है पर  सलिमा नहीं दिखाई देती है लगभग 10 दिन बाद बात नही  होती है |वह  बैठा होता है तभी  बुर्के में वह आ भी जाती हैं कॉलेज मे जैसा भी उस पर बात करने के लिए जाता है परंतु इतने में उसको कॉलेज  के मित्र  बुला लेते हैं और जब बात पूरी करता है देखता है तो वह जा चुकी होती है पर मिलना कहाँ लिखा था मुकद्दर में भी नहीं लिखा था दिमाग से बात करें से बात करें इस प्रकार कॉलेज 2 मिनट पर जाते हैं पर जाते हैं जाते हैं पर वह बात नहीं कर पाता इसी दौरान कॉलेज में फ्रेशर पार्टी का आयोजन आयोजन किया जाता है जूनियर के लिए और इस काम में भी सिनीयर की बहुत बड़ी भूमिका थी जयेश तैयारीया करवा रहा था तभी के नाम लिखा था कि कौन किस में पार्टिसिपेट करेगा पार्टिसिपेट करेगा इस प्रकार उस पर बात नहीं कर पाता है एक दिन की बातें सलिमा रैम्प वाक की तैयारी कर रही थी  को अपना पार्टनर चुनने   के लिए कहा गया था  तसलीमा ने अपना पार्टनर जैसे  ही  सुना बाद में पता लगा पता लगा कि नवीन गरिमा को बहुत चाहता है यह सुनकर जयेश को बहुत बुरा लगा हो तो बहुत खटक रहा था प्यारी में वह देखता था  उनकी बातें हो रही थी पर कभी खुद पार्क में जाकर उनसे में जाकर उनसे बात नहीं कर पाता यह देखकर जैसा लगा था जैसे मैंने बहुत को दिया

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मोहब्बत का एक अनसुना किस्सा  भाग 1

चलो सुनाता हूं जयेश ठाकुर की प्रेम कहानी जयेश राजस्थान के बाड़मेर जिले में रहता है और अक्सर यहां की संस्कृति पर अभी पाश्चात्य संस्कृति ने अपनी जडे़ नहीं जमायी है |
जयेश जब छोटा था तो उसकी सगाई हो गई थी और यह बाड़मेर में आम बात है बात है है | अब आयुष 21 साल का हो गया था और स्नातक की पढ़ाई का अंतिम वर्ष था था वर्ष था था इस दौरान आयु की जिंदगी में नया मोड़ मोड़ मोड़ में नया मोड़ मोड़ मोड़ जिंदगी में नया मोड़ मोड़ मोड़ में नया मोड़ मोड़ नया मोड़ मोड़ आता है जिंदगी में एक नया अध्याय शुरू हो जाता और उसकी वजह है है है उसकी वजह है है है सलीमा जिसको जयेश स्कूली टाइम से पसंद करता था परंतु स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद कभी सलीमा को को देख नहीं पाता है परंतु कॉलेज के अंतिम वर्ष के दौरान सलिमा जयेश के कॉलेज में पढ़ते आती हैं तो मानो उसके सपने साकार हो गए हो,

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द्वार पर ठिठके कदम क्यों आहटों को जानता हूँ ।

एक रचना

द्वार पर ठिठके कदम क्यों आहटों को पता है।

पा रहा है परस शीतल और सरगम ​​छंद सुरभित
देखिए फिर भी दिल पर शांत निष्ठुर कुछ
नित चूमती हो वंदन जिसका प्रीत में पागल बड़ी हो
प्रेम घोषित कर रहे हो द्वार पर आकर खड़ी हो
महामूर्ख पत्थर की ओर दूर भी दिख रहे हैं
ओ लहर! आप को बता दूँ इन दिनों को जानता हूँ।
द्वार पर ठिठके कदम क्यों आहटों को पता है।

श्याम तो दिखते नहीं फिर भी नहीं नहीं घट रहे सुरक्षित
पत्थरों से
पटाइल्सियाँ हैं लेकिन पनघट सुरक्षित चाहते हैं फोड़ जोड़ अधूरे भरे भी रीतित
प्रतीक्षा में कंकरों को हाथ में कब से दबाए जा
रहे हर बार धोखा सीखने लो चिकने घड़ों:
ओ घटों!

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कट्टरता

कट्टरता

आजकल जातिगत द्वेष और सांप्रदायिकता के मामले में देश का वातावरण इतना दूषित हो चुका है कि किसी व्यक्ति को खुद को पक्का जातिहितैषी साबित करना है तो अन्य जातियों का जमकर विरोध करना पड़ेगा , असली हिंदू साबित करना है तो अन्य धर्मों का खुल्लम खुल्ला विरोध करना पड़ेगा और खुद को सच्चा मुसलमान साबित करना है तो उन्हें हिंदुओं का भरपूर विरोध करना पड़ेगा ।जातिगत या धार्मिक तुष्टिकरण की भावना से प्रेरित इस अंध विरोध में कभी-कभी लोग राष्ट्र विरोध पर भी उतर आते हैं जो शायद किसी के भी हित में नहीं।

विरोध मुद्दे पर आधारित होना चाहिए ना कि जाति या धर्म के पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर।विरोध उसी का होना चाहिए जो गलत है फिर वह चाहे अपना हो या पराया लेकिन जिसे हम अपना समझते हैं वह भले ही गलत हो तो भी हम उसके समर्थन में उतर आते हैं और जिसे हम पराया समझते है वह भले ही सही हो तो भी हम उसका विरोध ही करते हैं।

इस संकीर्णता को बढ़ावा देने के लिए बाकायदा जाति एवं धर्म आधारित सेनाएं/ संगठन भी बने हुए हैं जिनके तथाकथित स्वयंभू अध्यक्ष खुद को अपनी जाति एवं धर्म का हितैषी बताते हुए लोगों को बरगलाने का काम करते हैं।

खुद को जाति या धर्म का सच्चा हितैषी साबित करने के लिए अन्य जातियों या धर्मों का विरोध करना ही अगर एकमात्र पैमाना बच गया है तो हम सबको इससे तौबा करते हुए जातिवादी या धार्मिक की बजाय इंसान ही बने रहना चाहिए,

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