Author: Ashish Anand Arya "Ichchhit"

दर्द वाला डाॅक्टर

 

घर के दरवाजे पर टँगी नाम-पट्टिका पर ‘डाॅक्टर‘ नाम चढ़ते देखना, सारे मुहल्ले वालों के लिए काफी आश्चर्यजनक घटना थी।

वैसे गंगाधर जी के भाषा-ज्ञान का उतना अनुभव न होता, तब तो उतनी ही सलवटें हमारे माथे पर भी पड़तीं। परंतु हम अनुभवी थे। हकीकत जानते थे। उनकी विद्वत्वता पर पूरा भरोसा था। आखिर होता भी क्यों न? दो-चार पोथियाँ तो हम ही से लेकर स्थायी उधार कर गये थे। उनमें से एक लौटाने का मौका भी आया था। बिल्कुल चपल प्रतिक्रिया की थी उन्होंने।

बस पता ही चला था उन्हें कि हमारे गाँव वाले भतीजे को किताब के आठ-दस पन्नों का ज्ञान बटोरना है। उसी दिन झाड़-पोछकर निकाल सामने रख ली थी। वरना उससे पहले तो बिल्कुल सहेजकर रखी थी हमारी किताब उन्होंने अपने दड़बे में। हमसे बात होने के बाद घंटे भर में नोट्स पूरे करके,

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दे दनादन… वोट…: आखिरी PART
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किन्नरों से क्षणिक भेंट सदैव की तरह बहुत रोचक थी। इसके पल-पल के रोमाॅच का मैंने अनुभव किया था। परंतु किन्नर अपनी धन-लोलुपता के कारण अपने जीवन के अवश्यंभावी लगते रोमाॅचक क्षणों से हाथ धो बैठे थे। हाॅ,

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दे दनादन… वोट…: PART – 9
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निर्जीव वस्तुओं के प्रेरणा-परक आख्यान से मैं अभिभूत था। हालाॅकि मन में अटकलें थीं। तथापि कुछ सहमते हुए,

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दे दनादन… वोट…: PART – 8
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🙅 ज़िद्दी लाडो 🙅

बचपन में जो भी बारिश नज़र के सामने आयी, उसने खूब कागज़ की कश्तियाँ देखी मेरे हाथों में। खूब चींटे-चीटियों को सैर करायी अपनी उन अरमान भरी कश्तियों में। और अगर जो उम्र की दहलीज़ ने पाँवों में ये समझदारी की बेड़ियाँ न बांध दी होतीं, फ़िर तो ज़रूर पूरी दुनिया ही सफ़र कर चुकी होती मेरी उन कागज़ी कश्तियों में और न जाने कितने चक्कर लग चुके होते इस पूरी दुनिया के!

खैर,

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ऐ वतन… हमको तेरी कसम…

“काश, इन गिरती आसमानी बिजलियों को रोकना भी इतना आसान काम होता!”
लगातार ऊँचे आकाश पर निगाहें टिकाये रत्नेश के होठों पर ये बिल्कुल लाज़िमी सवाल था। कई साल फ़ौज की सेवा में गुज़ारने के बाद अब तो उसे जैसे हर काम को ही चुटकियों में खत्म कर डालने की आदत हो गयी थी। पर ये सब तो जैसे कुदरत का कहर था, जिस पर उस जैसे किसी का कोई बस न था।

शाम ढलने को हो आयी थी। रात का अंधेरा आसमान को अपने काले रंग से गहराने पर उतारू था। और उसी बीच मानसूनी बारिश और कड़कती आसमानी बिजलियों का वो रोज़ का सिलसिला एक बार फ़िर से शुरू हो चुका था। इस मानसून और इसी बारिश का तो वहाँ जैसे हर किसी को ही इंतज़ार था,

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दे दनादन… वोट…: PART – 7
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देश की संस्कृति के निर्माण में देश के ऐतिहासिक और पौराणिक तथ्यों का सबसे बड़ा योगदान होता है। हमारे देश के संदर्भ में ऐसे नाना उल्लेख उपस्थित हैं,

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दे दनादन… वोट…: PART – 6

बाॅस के कमरे के द्वार पर दस्तक देते समय मैं रणबाॅकुरा अकेला था।

दस्तक की आहट भर से दस्तक देने वाले का ज्ञान कर लेना, अंर्तयामियों का कृत्य था। बाॅस बड़े जरूर थे, पर इतने नहीं कि मायावी कृत्यों को संपन्न कर सकें। स्वयं के मानवीय स्वरूप को उन्होंने अपने प्रश्न द्वारा प्रेषित किया-
‘‘कौन है?‘‘
प्रश्न के ठीक उपरांत, अपने नाम के उच्चारण द्वारा, बाहर खड़े-खड़े ही मैंने उत्तर अंदर मौजूद बाॅस तक पहुॅचा दिया।
उत्तर की आवाज बाॅस के कानों में पड़ते ही,

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दे दनादन… वोट…: PART – 5

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बाइसिकल पर बैठे-बैठे मैं विभिन्नताओं से परिपूर्ण विभीषिकाओं की एकता का गवाह बनता रहा। कई क्रमिक घटनाक्रमों को मैंने अपने नयनों के भीतर कैद किया। चलती हुई मेरी बाइसिकल फिर अगली बार तब ही रूकी,

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दे दनादन… वोट…: PART – 4

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ऊपर वाले की महिमा एवं उसकी समझदारी का मैं कृतज्ञ था। एक उपर वाला ही तो था, जिसे खुद के बनाये गये मुझ जैसे दुर्लभ प्राणी के बारे में सर्वस्व ज्ञान था। साँस लेना जीवन के लिए सर्वाधिक आवश्यक प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रम हेतु जिस उर्जा की आवश्यकता होती है,

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