Author: Dr. Sushree sangita Swain

कोरोना का क़हर

ये कैसा दौर आ गया ?
इनसान को इनसान से भय हो गया |
जीबन की रफ़्तार थम सी गयी हे,
जीने की चाह जैसे कम सी हो गयी हे ||
एक वायरस ने जीबन मैं उथल पुथल मचा रखा हे
गृहबास, लोगों से दुरी ही बचाब का उपाय बन गयी हे ||
कोरोना ने जीबन शैली ही बदल डाली हे
अबसाद ग्रस्त हो इनसान जीबन जी रहा हे ||
भगवान के द्वार भी भक्त के लिए बंध हो रहे हैं
तनाव,

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तलाक

तलाक, तलाक, तलाक

ये तीन शब्द जहर से भी प्राण घाती

आत्मा को अन्दर तक छलनी कर जाती

किस्मत ने किया ये कैसा मज़ाक

दे दिया उम्र भर का गम का सौगात

कागज़ की कुछ टुकड़े

करेंगे हमारे रिस्तो का हिसाब

बदल जाएगी ज़िन्दगी हमारी, हो जाएंगी राहे जुदा

इस शब्द ने बिस्वास तोड़ा, प्रेम तोड़ा, साथ तोड़ा

मेरा तो वजूद खोया,

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बेटा, बेटी मै भेद क्यों??

दोनों मैं ये भेद भाव क्यों ,

एक कुल का चिराग, दूसरा बोझ क्यों ?

एक के लिए शिक्षा का भर पुर साधन,

दूसरे के लिए चूल्हा चौका क्यों ?

एक के लिए आजादी, दूसरे के लिए पाबंदी क्यों?

एक तुम्हारे लिए सुनहरा भबिष्य,

दूसरा चिंता का बिषय क्यों?

एक की गलती बचपना,

दूसरे की गलती अपराध क्यों?

एक के पैदा होने पर खुशि का माहौल

दूसरे के लिए शोक,

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मेरा गाँव

गाँव मैं अब पहले सा कुछ ना रहा, वोह पगडण्डी, गली का आखरी मकान ना रहा |

वोह खेत खलियान ना रहा, वोह अल्हड़ बचपन वोह सौख जवानी ना रहा, कागज़ की कस्ती, बरसात का पानी ना रहा  ||

चिड़ियाँ की गुंजन, बच्चों की किलकारी ना रहा, सर पर बुजुर्गो का हात सहलाना ना रहा, साइकिल के टायर के पीछे बच्चों का भागना ना रहा  |||

वोह पीपल का पेड़,

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बंद करो ये ढकोसला

जब भी मदर्स डे मनाया करो,थोडी देर बृद्धाश्रम मैं घूम आया करो.

जब भी वैलेंटाइन डे मनाया करो, थोडी देर हॉस्पिटल मैं एसिड अटैक से जूझती किसी लड़की की दर्द भरी चीख सुन आया करो.

जब भी वोमेंस डे मनाया करो, स्त्री शिक्षा की रीढ़ साबित्री बाई फुले की स्मरण किया करो

क्यों की ये सब हमारे देश का रिवाज़ नहीं हे, मा, प्रेम, नारी किसी दिवस की मोहताज नहीं है

 

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