Posts tagged “Hindi”

सवाल

किसी के सवालों का इस तरह जवाब  दो ,

कि फिर वो सवाल ही न करें |

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इस्तमाल

सभी लोगों ने अपने हिसाब से

इस्तमाल किया मुझे

और हम इस गलत फहमी में

जी रहे थे कि सब लोग मुझे

पसंद  करते हैं।

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ख्याल

🤴 तुझे लेकर  मेरा ख्याल कभी नहीं

बदलेगा,

कि तुझे लेकर मेरा ख्याल कभी नहीं बदलेगा

लेकिन दिन और साल तो कई बदलेगा ,

पर तुम्हारे लिए मेरा प्यार कभी नही बदलेगा!

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जबरदस्ती

दुरीया अच्छी लगने लगी है

अब मुझे ,

किसी से जबरदस्ती का

रिश्ता रखने से,

किसी पर  अपना हक जताने से !

 

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माता-पिता

नहाने को पुछा न पानी गरम
हड्डियों को गंगा नहलाते हे वो
माता- पिता को आदर न दिया
और पंडित को शिश झुकाते हे वो
माता-पिता को न पुछा भोजन कभी
और हर साल बरसी मनाते हे वो
जीते जी हँसते हुए दर्द दिया इतना
मरने के बाद रो कर शोक मनाते हे वो

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पापा

किताबों से नहीं,

मेंने रास्तों की ठोकरों से सिखा है,

कि किताबों से नहीं  ,मेंने रास्तो की

ठोकरों से सिखा है

लाखों मुश्किलों में भी हसना

मैंने अपने पापा से सिखा है |

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आसूं

 

मुझे मनाने के लिए

उसका एक बार

मुस्कुरा कर देखना

ओर बोलना ही काफी है ,

लेकिन उसको

मनाने के लिए

मेरे लाखों आसूं

भी कम लगते हैं

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डिजिटल सावन

सावन आया है या अब वातावरण नहीं मोबाइल बता रहे हैं ।अचानक कुछ दिन पहले कोयल के बोलने की आवाज सुनी तो मैं हैरान हो उठी तो बाहर निकल कर देखा तो कुछ बच्चे कोयल का चित्र लगाकर पीछे से मोबाइल से कोयल की बोलने का रिंगटोन बजा रहे थे मानो सावन आने का अनुभव कर रहे हो । फिर मेरी भेज जिज्ञासा जाग गए पेड़ों को झूमता देखने की लेकिन इमारतों से गिरे शहर में पेड़ कहां मिलते हैं तो मैंने भी यूट्यूब खोला और लहराते पेड़ों का वीडियो देखकर मन बहला लिया । अब हवाओं की सरसराहट नहीं वाहनों का शोरगुल सुनाई दे रहा था ,कोयल की जगह कारखानों का शोर था ,फलों में मिठास की जगह दवाओं की खटास थी और मौसम भी अपनी रंगत की जगह कहर मचा रहा था । कुछ लोग कह रहे थे सावन तो आया बरसात नहीं आया और जहां आया वह इतनी की बाढ़ से लोगों में कोहराम मच गया । सावन तो हम जैसों के लिए सामान्य था जो इमारतों से घिरे थे ।

अब तो सावन का पता हर सोमवार को व्हाट्सएप या फेसबुक स्टेटस पर देख लगा लिया जाता है । सोमवारी आते हैं डीपी भोलेनाथ के चित्र में बदल जाती है। साथ ही सोमवार के सोमवार महादेव भी अपडेट होते जा रहे हैं । चिड़ियों की चहचहाहट और मोर का नृत्य भी ग्राफिक्स में ही दिखता है। यह डिजिटल सावन है। अब कवियों की शायरी और गुलजार गीतों के बजाय सावन का हिप हॉप और रैप ट्रेंड कर रहा है। अब तो इंडिया इतना डिजिटल हो गया है कि लोग  एक दूसरे से मिलने में भी हिचकिचाते हैं। सावन की हरियाली तो नोटों में भी दिखने लगी है जो लोग सावन आया  कहकर धूम मचाते थे अब नोटों की गर्मी दिखा रहे हैं।

सावन आते ही हवाओं में ताजगी आती थी,

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दर्द वाला डाॅक्टर

 

घर के दरवाजे पर टँगी नाम-पट्टिका पर ‘डाॅक्टर‘ नाम चढ़ते देखना, सारे मुहल्ले वालों के लिए काफी आश्चर्यजनक घटना थी।

वैसे गंगाधर जी के भाषा-ज्ञान का उतना अनुभव न होता, तब तो उतनी ही सलवटें हमारे माथे पर भी पड़तीं। परंतु हम अनुभवी थे। हकीकत जानते थे। उनकी विद्वत्वता पर पूरा भरोसा था। आखिर होता भी क्यों न? दो-चार पोथियाँ तो हम ही से लेकर स्थायी उधार कर गये थे। उनमें से एक लौटाने का मौका भी आया था। बिल्कुल चपल प्रतिक्रिया की थी उन्होंने।

बस पता ही चला था उन्हें कि हमारे गाँव वाले भतीजे को किताब के आठ-दस पन्नों का ज्ञान बटोरना है। उसी दिन झाड़-पोछकर निकाल सामने रख ली थी। वरना उससे पहले तो बिल्कुल सहेजकर रखी थी हमारी किताब उन्होंने अपने दड़बे में। हमसे बात होने के बाद घंटे भर में नोट्स पूरे करके,

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