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!! चाय-बिस्कुट वाली शाम… !

 

पूरे दिन की सिरदर्दी बाद
चाय और बिस्कुट की शाम!
संग तुम्हारे बैठ बतियातीं
मुझसे मेरी ख्वाहिशें तमाम!

उँगलियों की अठखेलियों से
माथे की तह में पलता सुकून,
दिनभर कैसे चलीं दूरियाँ
सोचता मैं तुमसे ज्यादा हैराँ!

खनखनाती खुश कलाइयों के
प्यार की कैद में यूँ महफूज़…
होठों पर गुनगुनी सी चुस्की
आँखों में खूब ढेर ईत्मीनान!

रूपये के रिवाज से मन गुस्सा
ये रोज-रोज का कैसा काम?

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!! नेह-पंखों की उड़ान !!

जब नेह ने पंख पसारे
प्रिय तुम मेरे ही थे सारे!
चित्तवत सुंदर वदन सलोना
ध्येय हुए अतुलित सब न्यारे!
जीवन की चंचल माया के अजब अद्भुत सहारे!

सिमटकर अंक के मोहक रंग में
किलकारी ने रूदन छंद वारे…
बालपन वाले दंभ को जीकर
नितांत सुख संभव संचारे!
जीवन की चंचल माया के अजब अनुपम सहारे!

तीर आयु-वेग के जी-भर चले
यूँ जले समर्थ रंग पखारे!

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सवाल

किसी के सवालों का इस तरह जवाब  दो ,

कि फिर वो सवाल ही न करें |

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इस्तमाल

सभी लोगों ने अपने हिसाब से

इस्तमाल किया मुझे

और हम इस गलत फहमी में

जी रहे थे कि सब लोग मुझे

पसंद  करते हैं।

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ख्याल

🤴 तुझे लेकर  मेरा ख्याल कभी नहीं

बदलेगा,

कि तुझे लेकर मेरा ख्याल कभी नहीं बदलेगा

लेकिन दिन और साल तो कई बदलेगा ,

पर तुम्हारे लिए मेरा प्यार कभी नही बदलेगा!

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जबरदस्ती

दुरीया अच्छी लगने लगी है

अब मुझे ,

किसी से जबरदस्ती का

रिश्ता रखने से,

किसी पर  अपना हक जताने से !

 

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माता-पिता

नहाने को पुछा न पानी गरम
हड्डियों को गंगा नहलाते हे वो
माता- पिता को आदर न दिया
और पंडित को शिश झुकाते हे वो
माता-पिता को न पुछा भोजन कभी
और हर साल बरसी मनाते हे वो
जीते जी हँसते हुए दर्द दिया इतना
मरने के बाद रो कर शोक मनाते हे वो

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पापा

किताबों से नहीं,

मेंने रास्तों की ठोकरों से सिखा है,

कि किताबों से नहीं  ,मेंने रास्तो की

ठोकरों से सिखा है

लाखों मुश्किलों में भी हसना

मैंने अपने पापा से सिखा है |

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आसूं

 

मुझे मनाने के लिए

उसका एक बार

मुस्कुरा कर देखना

ओर बोलना ही काफी है ,

लेकिन उसको

मनाने के लिए

मेरे लाखों आसूं

भी कम लगते हैं

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