Author: जुझार सिंह

मेरा भारत
  • By जुझार सिंह
  • |
  • Poetry
  • |
  • 428 Views
  • |
  • 0 Comment

*मेरा भारत*

मेरा भारत ऐसा हो जाएं ,
आने वाले सालों में,

बासंती संकल्प जुट जाएं ,
नवयुग के आवाहन में,
स्वर्णिम भावों से वंचित ,
अब नहीं रहे युग सेनानी,
स्वर्णिम आभा बनी रहे ,
पिछड़ न जाएं बलिदानी ,
दिशा दिशा में फैली रहें ,
शौर्य गाथा भारत की,
नई प्रेरणा के पल्लव,
लहराए जनमानस में,

मेरा भारत ऐसा हो जाएं ,

Read More
अपनो से पराया
  • By जुझार सिंह
  • |
  • Poetry
  • |
  • 338 Views
  • |
  • 0 Comment

अपनों ने कर दिया आज मुझे पराया
क्या मैं इतना बुरा लगने लगा हूं।
हर तरफ से दर्द के पत्थर बरसते हैं
क्या मैं इतना बुरा लगने लगा हूं।
क्यू लोग मेरे प्यार को नहीं समझते
क्या मैं इतना बुरा लगने लगा हूं।
मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है क्या अब
क्या मैं इतना बुरा लगने लगा हूं।
मैं मौत को गले नहीं लगा सकता हूं,

Read More
राजह्थानी कहानी
  • By जुझार सिंह
  • |
  • Satire
  • |
  • 250 Views
  • |
  • 0 Comment

इस्कूल री बात
राम राम सा !!

आजकाल इस्कूल भोत बदळीजग्या । टाबर भी एकदम छोटा छोटा इस्कूल जावै और मास्टरां गी जग्यां फूटरी फूटरी मैडम हुवै ।

म्हारै जमाने में आठवीं मैं भी दाढ़ी मूंछ हाळा इस्टूडेंट हुँवता …..दसवीं मै तो दो तीन टाबरां गा माईत भी पढ़ाई करता ।
और मास्टर गी तो पूछो मत ….धोती और खद्दर गो चोळो , एक एक बिलांत गी मूंछ ….जाणै जल्लाद है । ऊपर स्युं हाथ मै तेल स्युं चोपडेड़ो डंडो !!!

Read More
योग से निरोग

कुछ अलग सी दुनिया का अलग मिजाज लिख दू
कदम बढ़ाते 21 वी सदी में भारत के नाम लिख दू
मुझे नहीं तमन्ना दरबारों के गुणगान करने की
देश हित में रहते हैं जो लोग उन्हीं लोगों के  नाम लिख दू

कुछ तूफानी लिखना छोड़ आज योग लिख दूं
पुरातन की संस्कृति के नव के नव संस्कृति के नव निर्माण को लिख दू
मुझे नहीं जिम जाकर जाकर पसीना बहाने की चाहत
मैं घर पर ही ऋषि मुनियों की योग साधना साधना की योग साधना साधना तप ही कर लू

आओ मिलकर योग करते हैं
काया को योग से निरोग करते हैं
प्रभात की बेला में में सूर्य नमस्कार करते हैं
आओ मिलकर योग करते हैं

अखंड भारत के सपने की मिलकर हुंकार भरते हैं
विश्व को एक सूत्र में बांधने का प्रयास करते हैं
हर तरफ से छाया हुआ है महामारी का खौफ इस कदर
आओ मिलकर योग से इसे परास्त का प्रयास करते हैं आओ मिलकर योग योग मिलकर योग योग करते हैं

इस दिवस पर महामारी से पार पाते हैं
बिछड़े हुए जोड़ों के प्यार का इजहार कराते हैं
दुनिया में पास आकर नहीं कर योग सकते तो क्या
सभी को बोल कर घर पर ही योग कराते हैं

Read More
विजय गाथा लिख देता हूं मैं कश्मीर के घाटी की

विजय गाथा लिख देता हूं मैं कश्मीर के घाटी की
तपोवन की स्थली स्वर्ग के माटी की

उस धरा की जहां फूलों की खुशबू महक उठती थी
वही भूमि जिसे देख परिया शर्माती थी

आज उस धरा का स्वर्णिम युग आया
कश्मीर आज भारत का मुकुट फिर से कहलाया

कारगिल से कन्याकुमारी तक बस एक ही आवाज थी
बुलंद रहे तिरंगा हर भारतवासी की आवाज थी

कुछ सियारों को आज घड़ियाली आंसू रोते देखा
कुछ कुत्तों की दुम को सीधा देखा

वही कुत्ते आज खामोश हो गए
आतंक का तो पता नहीं पत्थरबाज गुम हो गए
कश्मीरी पंडितों की याद आते ही रूह कांप जाता था
यह करुणामय दृश्य हमेशा मुझे रुलाता था

उस दृश्य का अंत हो गया घाटी से
तपोवन की स्थली स्वर्ग की माटी से

तोड़ आतंक को दो हिस्सों में
नया इतिहास लिखने में
मुखर्जी की याद दिला दी
तुम्हें बहुत लगा था 370 हटाने में

“सृजन”

Read More
बरसात का मौसम

कभी बरसात के मौसम में
कभी पतझड़ के मौसम में
उसी की याद आती है
हर लम्हा के मौसम में

वो इस कदर मुरत है मोहब्बत की
छा जाती है फूलो में बंसत के मौसम सी

मुझे इंतजार था ग्रीष्म में
पानी बनके मिलने आओगी
वर्षा का है इंतजार
नवनिर्माण कराओगी

मुझे जीना है तेरे साथ
तु साथ दे देना
करेगे प्यार ऐसा
तु कल दे देना

Read More
मोहब्बत का एक अनसुना किस्सा भाग -02

भाग 1: https://rentreadbuy.com/index.php/2020/06/16/mohabbat-ka-ek-ansuna-kissa-1

मन मसलकर पापा को ले आता है परंतु उसने देखा नहीं
अगले दिन फिर वही होता है जाता है पर  सलिमा नहीं दिखाई देती है लगभग 10 दिन बाद बात नही  होती है |वह  बैठा होता है तभी  बुर्के में वह आ भी जाती हैं कॉलेज मे जैसा भी उस पर बात करने के लिए जाता है परंतु इतने में उसको कॉलेज  के मित्र  बुला लेते हैं और जब बात पूरी करता है देखता है तो वह जा चुकी होती है पर मिलना कहाँ लिखा था मुकद्दर में भी नहीं लिखा था दिमाग से बात करें से बात करें इस प्रकार कॉलेज 2 मिनट पर जाते हैं पर जाते हैं जाते हैं पर वह बात नहीं कर पाता इसी दौरान कॉलेज में फ्रेशर पार्टी का आयोजन आयोजन किया जाता है जूनियर के लिए और इस काम में भी सिनीयर की बहुत बड़ी भूमिका थी जयेश तैयारीया करवा रहा था तभी के नाम लिखा था कि कौन किस में पार्टिसिपेट करेगा पार्टिसिपेट करेगा इस प्रकार उस पर बात नहीं कर पाता है एक दिन की बातें सलिमा रैम्प वाक की तैयारी कर रही थी  को अपना पार्टनर चुनने   के लिए कहा गया था  तसलीमा ने अपना पार्टनर जैसे  ही  सुना बाद में पता लगा पता लगा कि नवीन गरिमा को बहुत चाहता है यह सुनकर जयेश को बहुत बुरा लगा हो तो बहुत खटक रहा था प्यारी में वह देखता था  उनकी बातें हो रही थी पर कभी खुद पार्क में जाकर उनसे में जाकर उनसे बात नहीं कर पाता यह देखकर जैसा लगा था जैसे मैंने बहुत को दिया

Read More
मोहब्बत का एक अनसुना किस्सा  भाग 1
  • By जुझार सिंह
  • |
  • Story
  • |
  • 446 Views
  • |
  • 8 Comments

चलो सुनाता हूं जयेश ठाकुर की प्रेम कहानी जयेश राजस्थान के बाड़मेर जिले में रहता है और अक्सर यहां की संस्कृति पर अभी पाश्चात्य संस्कृति ने अपनी जडे़ नहीं जमायी है |
जयेश जब छोटा था तो उसकी सगाई हो गई थी और यह बाड़मेर में आम बात है बात है है | अब आयुष 21 साल का हो गया था और स्नातक की पढ़ाई का अंतिम वर्ष था था वर्ष था था इस दौरान आयु की जिंदगी में नया मोड़ मोड़ मोड़ में नया मोड़ मोड़ मोड़ जिंदगी में नया मोड़ मोड़ मोड़ में नया मोड़ मोड़ नया मोड़ मोड़ आता है जिंदगी में एक नया अध्याय शुरू हो जाता और उसकी वजह है है है उसकी वजह है है है सलीमा जिसको जयेश स्कूली टाइम से पसंद करता था परंतु स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद कभी सलीमा को को देख नहीं पाता है परंतु कॉलेज के अंतिम वर्ष के दौरान सलिमा जयेश के कॉलेज में पढ़ते आती हैं तो मानो उसके सपने साकार हो गए हो,

Read More
द्वार पर ठिठके कदम क्यों आहटों को जानता हूँ ।
  • By जुझार सिंह
  • |
  • Poetry
  • |
  • 366 Views
  • |
  • 1 Comment

एक रचना

द्वार पर ठिठके कदम क्यों आहटों को पता है।

पा रहा है परस शीतल और सरगम ​​छंद सुरभित
देखिए फिर भी दिल पर शांत निष्ठुर कुछ
नित चूमती हो वंदन जिसका प्रीत में पागल बड़ी हो
प्रेम घोषित कर रहे हो द्वार पर आकर खड़ी हो
महामूर्ख पत्थर की ओर दूर भी दिख रहे हैं
ओ लहर! आप को बता दूँ इन दिनों को जानता हूँ।
द्वार पर ठिठके कदम क्यों आहटों को पता है।

श्याम तो दिखते नहीं फिर भी नहीं नहीं घट रहे सुरक्षित
पत्थरों से
पटाइल्सियाँ हैं लेकिन पनघट सुरक्षित चाहते हैं फोड़ जोड़ अधूरे भरे भी रीतित
प्रतीक्षा में कंकरों को हाथ में कब से दबाए जा
रहे हर बार धोखा सीखने लो चिकने घड़ों:
ओ घटों!

Read More
कट्टरता

कट्टरता

आजकल जातिगत द्वेष और सांप्रदायिकता के मामले में देश का वातावरण इतना दूषित हो चुका है कि किसी व्यक्ति को खुद को पक्का जातिहितैषी साबित करना है तो अन्य जातियों का जमकर विरोध करना पड़ेगा , असली हिंदू साबित करना है तो अन्य धर्मों का खुल्लम खुल्ला विरोध करना पड़ेगा और खुद को सच्चा मुसलमान साबित करना है तो उन्हें हिंदुओं का भरपूर विरोध करना पड़ेगा ।जातिगत या धार्मिक तुष्टिकरण की भावना से प्रेरित इस अंध विरोध में कभी-कभी लोग राष्ट्र विरोध पर भी उतर आते हैं जो शायद किसी के भी हित में नहीं।

विरोध मुद्दे पर आधारित होना चाहिए ना कि जाति या धर्म के पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर।विरोध उसी का होना चाहिए जो गलत है फिर वह चाहे अपना हो या पराया लेकिन जिसे हम अपना समझते हैं वह भले ही गलत हो तो भी हम उसके समर्थन में उतर आते हैं और जिसे हम पराया समझते है वह भले ही सही हो तो भी हम उसका विरोध ही करते हैं।

इस संकीर्णता को बढ़ावा देने के लिए बाकायदा जाति एवं धर्म आधारित सेनाएं/ संगठन भी बने हुए हैं जिनके तथाकथित स्वयंभू अध्यक्ष खुद को अपनी जाति एवं धर्म का हितैषी बताते हुए लोगों को बरगलाने का काम करते हैं।

खुद को जाति या धर्म का सच्चा हितैषी साबित करने के लिए अन्य जातियों या धर्मों का विरोध करना ही अगर एकमात्र पैमाना बच गया है तो हम सबको इससे तौबा करते हुए जातिवादी या धार्मिक की बजाय इंसान ही बने रहना चाहिए,

Read More
X
WhatsApp WhatsApp us